शामली। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों का जोर इस बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर केंद्रित होता दिख रहा है। इलाके में 136 विधानसभा सीटें हैं। पूर्वांचल में ब्राह्मणों की कथित नाराजगी को देखते हुए भाजपा की कोशिश वहां के संभावित नुकसान की भरपाई पश्चिमी उत्तर प्रदेश से करने की है।
इसके लिए पश्चिम बंगाल में आजमाए हुए फार्मूले पर रणनीति तैयार कर रही है। विपक्षी दल सपा और कांग्रेस भी इसी इलाके पर ज्यादा जोर देते दिख रहे हैं। उनकी कोशिश इलाके की ज्यादातर मुस्लिम बहुल सीटों पर कब्जा जमाने की है।
वेस्ट यूपी सियासी और सामाजिक तौर पर काफी जागरूक क्षेत्र है। सामान्यतः इस इलाके में जाट-मुस्लिम अथवा मुस्लिम- दलित- पिछड़ा के परंपरागत गठजोड़ से पार्टियां जीतती रही हैं। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के बाद सामाजिक समीकरण में काफी बदलाव आया है। जाटों का एक धड़ा रालोद से खिसककर भाजपा के साथ है। सैनी, प्रजापति, कश्यप जैसी गैर यादव पिछड़ी जातियों और गैर जाटव कुछ दलितों का साथ मिलने से ही भाजपा 2022 में यहां की 70% सीटों पर जीतने में सफल रही थी।
भाजपा की उम्मीद इस बार इसलिए और ज्यादा बढ़ गई है कि इस बार भाजपा-रालोद का गठबंधन है। लेकिन, भाजपा के रणनीतिकार जानते हैं कि सीटें बढ़ाने के लिए सिर्फ यह गठबंधन ही काफी नहीं होगा। पश्चिमी यूपी की करीब 73 सीटों पर मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से ज्यादा है। इनमें रामपुर, मुरादाबाद, संभल, सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा और मुजफ्फरनगर जैसी सीटें शामिल हैं।
70 सीटों पर मुस्लिम आबादी 20 से 30 प्रतिशत के बीच है। यही सीटें भाजपा का टारगेट होंगी। 2022 में रालोद के साथ गठबंधन में सपा ने इनमें से ज्यादातर सीटें जीती थीं। इस बार ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम प्रदेश की 200 सीटों पर प्रत्याशी उतारने की तैयारी में है। उनका लक्ष्य पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मुस्लिम बहुल सीटें हैं। उनकी नजर खासतौर पर उन मुस्लिम नेताओं पर होगी, जो चुनाव लड़ना चाहते हैं लेकिन, सपा या कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया।
ये है भाजपा का पश्चिम बंगाल फार्मूला
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम बहुल और मुस्लिम प्रभाव वाले जिले की 43 विधानसभा सीटों पर दशकों से टीएमसी का एकाधिकार था, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ऐसा सियासी समीकरण सेट किया कि टीएमसी को सीटों के लाले पड़ गए।
मुस्लिम मतदाता टीएमसी, कांग्रेस, सीपीआई (एम), इंडियन सेकुलर फ्रंट, हुमायूं कबीर की एजेयूपी और अन्य छोटे दलों में बंट गए। भाजपा को मुस्लिम वोट की जरूरत नहीं पड़ी, बस विपक्षी वोटों के विभाजन ने उसके पक्ष में समीकरण बदल दिए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसी फार्मूले के तहत अल्पसंख्यक वोटों का बांटने की रणनीति अपनाई
जा रही है।















