नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) विवाद में न्यायिक बिरादरी अब दो खेमों में बंटती दिख रही है। एक तरफ जहां 42 पूर्व जजों ने SIR के समर्थन में खुली चिट्ठी लिखी है और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार का बचाव किया है, वहीं सुप्रीम कोर्ट के सीटिंग जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने पिछले दिनों SIR की आलोचना की थी और कहा था कि लाखों भारतीय नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मूल रूप से मनमानी और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है। इसके बाद पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई ने जस्टिस भुइयां के बयानों की आलोचना की और कहा कि किसी भी मौजूदा न्यायाधीश को ऐसे मुद्दे पर बयान नहीं देना चाहिए, जिस पर उसी अदालत में सुनवाई लंबित हो।
अब सुप्रीम कोर्ट के एक और रिटायर्ड जज जस्टिस अभय एस ओका का इस मामले में बयान आया है। जस्टिस ओका ने जस्टिस गवई से अलग राय रखते हुए साफ कहा है कि वोटरों से बड़े पैमाने पर मताधिकार छीनने के खिलाफ जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणी में कुछ भी अनुचित नहीं है। जस्टिस ओका ने कहा, "एक नागरिक के तौर पर जजों का इस प्रक्रिया (SIR) के बारे में बात करने में कुछ भी गलत नहीं है।" इसके साथ ही जस्टिस ओका ने SIR के साथ अपने अनुभव भी साझा किए। उन्होंने बताया कि सरनेम में स्पेलिंग की गलती के कारण उन्हें 'फॉर्म 8' भरने के लिए कहा गया था।
दरअसल, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की इस टिप्पणी पर विवाद खड़ा हो गया था कि किसी भी अदालत द्वारा वोटरों के बड़े पैमाने पर मताधिकार छीनने को मंजूरी नहीं दी जा सकती। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय ओका ने जस्टिस भुइयां की टिप्पणी का बचाव करते हुए कहा कि मौजूदा सुप्रीम कोर्ट जज ने कोई न्यायिक अनुचित काम नहीं किया है। जस्टिस ओका ने कहा कि किसी दूसरी बेंच या अपनी ही बेंच के सामने लंबित मामले के गुण-दोष पर मौजूदा जज की टिप्पणी शायद उचित न हो लेकिन जस्टिस भुइयां के भाषण में ऐसा नहीं हुआ।















