पिछले कुछ वर्षों में नई तारिकाओं के आने-जाने और गुम होने की बात खूब सुनने को मिल रही है। इसे यदि हम पुरानी नायिकाओं के संदर्भ में देखें, तो सुरैया, निम्मी, मधुबाला से लेकर माधुरी दीक्षित, ऐश्वर्या, प्रियंका चोपड़ा तक बॉलीवुड को कभी अच्छी हीरोइन के अभाव का सामना नहीं करना पड़ा। मगर अब कई आलोचक मानते हैं कि दीपिका पादुकोण के बाद से इसमें एक बड़ा ठहराव आ गया है। कोई भी नई तारिका आकर इस सिलसिले को गति नहीं दे पा रही है।
इसमें संदेह नहीं है कि दीपिका अपने पुराने रुतबे को अब शायद ही हासिल कर पाए। उन्हें तारिकाओं के इस शीर्षकाल की अंतिम कड़ी माना जा रहा है। प्रसिद्ध आलोचक रामसूरत मार्या बताते हैं कि फिलहाल तो उनके जैसा स्पार्क नयी किसी भी अभिनेत्री की प्रस्तुति में दिखाई नहीं पड़ा है। मार्या कहते हैं, ‘दीपिका की प्रस्तुति का अपना एक अलग अंदाज था। उसका सम्मोहन आज तक है। मगर वक्त की शाख पर पत्ते तो सूखते ही हैं।’ दीपिका ने भी कबूल कर लिया है कि वह अब किसी दौड़ में नहीं हैं। उनकी जगह आलिया भट्ट ने ली थी, पर उनका क्रेज कुछ खास नहीं चला। इसके बाद से ही कई तारिकाओं में होड़ जारी है। कृति सैनन, कियारा आडवाणी आदि दावे पेश तो करती हैं, लेकिन जल्द ही दम फूल जाता है। सुपरहिट फिल्म ‘सैयारा’ की नवोदित तारिका अनीत पड्ढा ने भी अपना मजबूत दावा पेश किया है। पर उन्हें अभी कुछ वक्त देना पड़ेगा।
कुछ यही हाल बाकी नवोदित तारिकाओं का भी है। वाणी कपूर, कियारा आडवाणी, कृति सैनन, सारा अली खान, रश्मिका मंदाना, जाह्नवी कपूर आदि की बात जाने दें, तो अनन्या पांडे, अनीत पड्ढा, तृप्ति डिमरी आदि भी आने-जाने के खेल में शामिल हैं। पर इनके स्टारडम हासिल करने की क्षमता पर आलोचकों को संशय है।
निस्संदेह बॉलीवुड में हीरोइन का स्वर्णकाल ‘50 से ‘90 के दशक तक माना जाता है। इस दौर के दौरान सुरैया से लेकर निम्मी, मधुबाला, नर्गिस, मीना कुमारी, वैजयंतीमाला, माला सिन्हा, वहीदा रहमान, हेमा मालिनी, रेखा, फिर माधुरी दीक्षित, ऐश्वर्या राय, श्रीदेवी आदि एक के बाद आई तारिकाओं की वजह से बॉलीवुड में हमेशा रौनक रही है। फिल्मों के जानकार राजगोपाल नांबियार कहते हैं, ‘ 1990 से बॉलीवुड की रौनक गायब हो रही है। जबकि हिंदी फिल्मों में कभी हीरोइन का अलग ही आकर्षण होता था। दर्शक इसी चार्म के चलते थिएटर आते थे।’
हर दौर में तीन-चार हीरोइन का सम्मोहन हावी रहा है। जहां सुरैया के रूप की बढ़-चढ़कर चर्चा होती थी, वहीं मधुबाला की खूबसूरती सभी को मोहित कर देती थी। वहीं नर्गिस से लेकर कामिनी कौशल तक कई हीरोइनों के सौंदर्य का अपना अलग-अलग सम्मोहन था। इनकी हर गतिविधि में दर्शकों की रुचि होती थी। यदि कीजिए सुरैया-देव की अति चर्चित प्रेम कहानी को। इनका विवाह जब नहीं हुआ, तो इनके प्रशंसक काफी हताश हुए थे। लोकप्रिय हीरोइनों के ऐसे किस्सों की लंबी फेहरिस्त है।
उस समय ज्यादातर हीरोइनों का अपना तिलिस्म और रुतबा होता था। कई चोटी की तारिकाएं तो पूरे दबदबे के साथ अपनी शर्तों पर फिल्मों में काम करती थीं और उन्हें फिल्म के नायक से ज्यादा तवज्जो मिलती थी। सुरैया, मधुबाला, नर्गिस, मीना कुमारी, वैजयंतीमाला, माला सिन्हा आदि तो हीरो के बराबर की फीस लेती थीं। इनके फैन भी होते थे, जो इनका एक अतिरिक्त प्लस पॉइंट होता था। जैसे कि ढेरों सिने-रसिक जहां मीना कुमारी या माला सिन्हा की सादगी के कायल थे, वहीं वैजयंतीमाला या शर्मिला टैगोर की अदाओं का भी अपना अलग प्रशंसक वर्ग होता था।
असल में ज्यादातर हीरोइनों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वे बोल्डनेस के भरोसे रहती हैं। इस चक्कर में वे अपने आपको बहुत एक्सपोज कर देती हैं। इसमें उनकी सौम्यता और सादगी को बड़ा झटका लगता है।
किसी भी छोटी-बड़ी तारिका को जरा-सी लोकप्रियता मिलते ही अलग-अलग इंडोर्समेंट के ऑफर भी मिलने लगते हैं और अक्सर उनके बड़े इंडोर्समेंट का पारिश्रमिक किसी फिल्म के बराबर होता है। मसलन, अब कियारा आडवाणी के पास इतने ज्यादा इंडोर्समेंट हैं कि वे चाहकर भी फिल्मों पर बहुत कम ध्यान दे पाती हैं।
कमी इनकी संजीदगी में होती है, जबकि एक्टिंग हमेशा आपसे समर्पण की मांग करती है। यह पाठ वे पुराने दौर की दिग्गज हीरोइनों से सीख सकती हैं, पर नया कुछ सीखने या कोई चैलेंजिंग रोल करने में इनकी कोई खास दिलचस्पी नहीं, सिर्फ अपनी फीस और प्रचार से मतलब होता है। इसी चूक के चलते वे धीरे-धीरे लाइमलाइट से गायब हो जाती हैं।















