संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। बढ़ती गर्मी के साथ-साथ आधुनिक निर्माण शैली में कंक्रीट और शीशे की इमारतों का तेजी से विस्तार भी एक प्रमुख कारण है। नई इमारतें चाहे व्यावसायिक क्षेत्रों के ग्लास टावर हों या अनधिकृत बस्तियों के माचिस के मकान, इनके दोषपूर्ण डिज़ाइन बाहरी गर्मी को अंदर फँसा लेते हैं। पारंपरिक वेंटिलेशन के अभाव में घरों और कार्यालयों के भीतर 'थर्मल स्ट्रेस' खतरनाक सीमा पर पहुँच गया है, जिससे लोगों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ देखी जा रही हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की ताज़ा रिपोर्ट 'मेकिंग दिल्ली हीट रेजीलिएंट' में इस मुद्दे को रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी का लगभग एक तिहाई हिस्सा 'माइक्रो-थर्मल स्ट्रेस' की चपेट में है, जिसके कारण दिन-रात के तापमान में अंतर लगातार कम हो रहा है। यह स्थिति न केवल पर्यावरणीय संकट बल्कि आर्थिक और मानवाधिकार संकट भी बन गई है।
पारंपरिक जल निकायों के वाष्पीकरण तंत्र को भी अनियंत्रित कंक्रीटीकरण ने नुकसान पहुँचाया है। इन जल स्रोतों को केवल जल भंडारण के लिए नहीं, बल्कि शहर के प्राकृतिक 'लोकल कूलिंग वेंट्स' के रूप में भी डिज़ाइन किया गया था। परंतु इन्हें घेरने वाले अव्यवस्थित निर्माण ने इनके प्राकृतिक वाष्पीकरण को पूरी तरह बिगाड़ दिया है, जिससे ये जलाशय अब शहर को ठंडा करने में असमर्थ हैं। सीएसई के सस्टेनेबल हैबिटेट प्रोग्राम निदेशक रजनीश सरीन के अनुसार, 'हीट एक्शन प्लान' में ऐसी ठोस रणनीतियों का अभाव है जो सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों और निवासियों की सहनशीलता बढ़ा सके। व्यावहारिक उपायों की कमी से प्रभावित लोगों की संख्या में निरंतर वृद्धि होने की आशंका है।
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