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भारत में केवल 1.8 करोड़ ‘कॉकरोच’!

भारत में केवल 1.8 करोड़ ‘कॉकरोच’!

By वरिष्ठ संवाददाता|24 मई, 2026

भला इतने कम ‘कॉकरोच’! बावजूद इसके देसी ऑनलाइन जमात का उछलना! हल्ला कि देखो, पांच दिनों में ही कॉकरोच जनता पार्टी के फॉलोवर भाजपा से अधिक हुए! योगेंद्र यादव ने तपाक से कहा, एक मीम ने देश के भीतर की सुगबुगाहट दिखला दी। वही प्रधानमंत्री मोदी के होश उड़े। केंद्र सरकार की खुफिया एजेंसी आईबी को कॉकरोचों के पीछे लगाया गया। सरकार को चैन तभी हुआ जब कॉकरोच जनता पार्टी के एक्स (ट्विटर) खाते पर ताला लगा।

सोचें, भारत सरकार पर। उसे इतना भी ध्यान नहीं कि कॉकरोच कभी खत्म नहीं होते। कहा जाता है परमाणु विस्फोट में भी कॉकरोच बच के निकल जाते हैं! शायद इसलिए कॉकरोच पार्टी के फॉलोवरों का डिजिटल जोश कायम है। बावजूद इसके इनके लिए भी सोचने वाली बात होनी चाहिए कि पांच दिन में केवल 1.8 करोड़ ‘कॉकरोच’ ही क्यों जुड़े! जिस देश में राज्य/समाज/बाज़ार/मंदिर/चौराहे पर खड़े खैरातियों/लाभार्थियों की संख्या सौ करोड़ से अधिक है, उसमें इतने कम फॉलोवरों का ऑनलाइन आना क्या बतलाता है। मध्यवर्ग के ही कॉकरोच उछल रहे हैं। गरीब-गुरबे दूर ही हैं।

असल बात कॉकरोच राजनीति का भारत कमाल है। माईबाप सरकार निश्चित ही चिंता में है। पांच दिनों में यदि 1.8 करोड़ ‘कॉकरोच’ ऑनलाइन दिखलाई दे जाएं तो वह समय दूर नहीं है जब सरकार 140 करोड़ की भीड़ की परजीविता से हाथ खींच ले। सोचें, भारत में ‘फर्जी और बेहूदा डिग्री’ वाले कॉकरोच किसने पैदा किए हैं? क्या सरकार और उसकी व्यवस्थाओं, राजनीति ने नहीं? मोदी सरकार में यह काम विशाल पैमाने में हुआ। तभी टॉप से लेकर नीचे तक ‘फर्जी और बेहूदा डिग्री’ धारी कॉकरोच चौतरफा फैले हैं। किसी ने किसी की कृपा से मंत्री पद पाया, जज पद पाया तो तो प्रभु की कृपा के परजीवी भक्तों और स्वयंसेवकों की भी कमी नहीं है। भाजपा ने ही सर्व शिक्षा अभियान शुरू किया था। बिना परीक्षा के भी कक्षा-दर-कक्षा ऊपर बैठाने के सिलसिले से पैदा डिग्रीधारी नौजवान शक्ति। तभी कौन हिसाब लगा सकता है कि कितने करोड़ ऐसे कॉकरोच घूम रहे हैं? अमित शाह को जनगणना से इसकी (परजीवियों की) जानकारी जरूर एकत्र करानी चाहिए। कितने बेरोजगार, इधर-उधर हाथ-पांव मारते हुए परजीवी हैं? संख्या बीस करोड़ मानें या चालीस करोड़?

हां, कॉकरोच की भारत परिभाषा में ‘परजीविता’ पहली शर्त है। मतलब न काम का, न काज का और दुश्मन अनाज का। अपना पेट भरने के लिए दूसरों को तंग करता हुआ, दूसरों पर आश्रित, खैरात, धर्मादा, राशन आदि की कतार में लगी लाभार्थी भीड़ तो आरटीआई, एक्टिविस्टों की भीड़ भी! परजीवियों का अपना कोई मूल्य-सृजन नहीं होता। परिश्रम नहीं, बुद्धि नहीं और जिंदा रहने के लिए मात्र राज्य/समाज/बाज़ार/मंदिर/चौराहे पर हाथ पसारे खड़े हुए या सवाल करते हुए, नींद में खलल डालते हुए।

मनुष्य गरिमा में परजीविता याकि कॉकरोच का रूपक बहुत खराब है। बावजूद इसके भारत में आज अपने आपको कॉकरोच बतलाती भीड़ है तो क्या अर्थ है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कॉकरोचों की डिजिटल उपस्थिति पर भी प्रतिबंध लगाया तो क्यों? क्या पता चंद महीनों में पचास-सौ करोड़ लोग अपने को कॉकरोच बताएं और दुनिया सोचने लगे कि भारत किनका देश है, मोदी किनके प्रधानमंत्री हैं?

जो हो, इक्कीसवीं सदी का भारत सत्य परजीवियों की भीड़ है। केवल मोदी सरकार माईबाप और बाकी सब याकि विधायिका हो या न्यायपालिका या मीडिया या प्रजा, सब उनके आसरे जिंदा। क्या यह आज की हकीकत नहीं है? लाभार्थी याकि परजीवी आबादी ही विकसित भारत की छलांग है।

यों बतौर राजनीतिक रूपक के कॉकरोच मामूली नहीं हैं। कॉकरोच 140 करोड़ आबादी की वास्तविकताओं के कई सत्य उकेरता है। ध्यान रहे, कॉकरोच बिना व्यवस्थाओं के भी जिंदा रह लेते हैं। कॉकरोच शरीर ऐसे ganglia (छोटे nerve centers) लिए होता है, जिससे उसके बेसिक मूवमेंट, रिफ्लेक्स अपने आप काम करते हैं। उसमें दिमाग नहीं होता। शरीर स्वंय चलता होता है। कॉकरोच शरीर के किनारों पर छोटे छेदों (spiracles) से सांस लेता है। सिर न होने पर भी उसे ऑक्सीजन मिलती रहती है। मतलब उसका जीवन सोच के बिना भी, आदत अनुसार शरीर के जीवन-नियंत्रण स्थापत्य में चलता होता है। वह मारने से नहीं मरता। भले स्प्रे करें, चप्पल मारें, रोशनी जलाएं, वह भागेगा, छिपेगा पर फिर लौट आएगा। वह स्थितियों से एडजस्ट कर जीता है! कॉकरोच अंधेरे का याकि झूठ में जीने वाला प्राणी है। उसे उजाला, सत्य पसंद नहीं। वह दरारों, पाइपों, रसोई के पीछे, व्यवस्था की नमी में दबा हुआ फलता है!

उस नाते योगेंद्र यादव ने ठीक कहा है कि कॉकरोच के मीम के लिए फटाफट उमड़े अनुयायियों से जाहिर है, बदबू, गंदगी, सीलन का आज कैसा समय है। पर इसका अर्थ यह नहीं है कि सोशल मीडिया उबाल से कोई क्रांति पैदा हो जाए! संभव ही नहीं है। कॉकरोच, कॉकरोच जैसे ही जिएंगे। भारत में राशन/सब्सिडी/लाभार्थी/क्रोनीवाद से ऐसे परजीवी पैदा हुए हैं जो मीम्स की घोषणाओं, मैनिफेस्टो से विचलित नहीं होने वाले हैं।

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