जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने निजता और पहचान के अधिकार के बीच संतुलन बनाते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने माना कि बच्चे का अपने जैविक पिता को जानने का अधिकार किसी व्यक्ति की निजता से ऊपर होता है। इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया है और पिता होने से इनकार करने वाले व्यक्ति की अपील खारिज कर दी है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और एन. कोटीश्वर सिंह की पीठ ने यह फैसला सुनाया है। कोर्ट ने डीएनए टेस्ट के आदेश को चुनौती देने वाली अपील को रद्द करते हुए निचली अदालत और हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित दीवानी अदालत को निर्देश दिया कि वह डीएनए टेस्ट की तारीख तय करे और उसके परिणाम के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाए।
मामले में एक व्यक्ति ने बेटा होने का दावा करते हुए संपत्ति में हिस्सेदारी के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया। निचली अदालत और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पितृत्व निर्धारण के लिए डीएनए टेस्ट का आदेश दिया था, जिसे पिता होने से इनकार करने वाले व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उसने निजता के अधिकार का हवाला देते हुए कहा कि उसे डीएनए टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने पिछले फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि डीएनए टेस्ट का आदेश तभी दिया जाता है जब यह सीधे मामले से जुड़ा हो, कोई अन्य सबूत उपलब्ध न हो, और न्याय के हित में हो। मामले में राजीव (नाम बदला) और प्रवीण (नाम बदला) की माँ के बीच जनवरी 1999 में संबंध थे और प्रवीण का जन्म सितंबर 1999 में हुआ। राजीव ने लगातार पिता होने से इनकार किया है और कोई ठोस सबूत नहीं मिला।
कोर्ट ने कहा कि प्रवीण का मुकदमा सीधे पितृत्व निर्धारण से जुड़ा है और इस मामले में हितों का संतुलन प्रवीण के पक्ष में है। कोर्ट ने निजता के अधिकार को 'पूर्ण नहीं' बताते हुए कहा कि बच्चे के अधिकारों को निजता से ऊपर रखा जाना चाहिए ताकि उसे अपने वंश और संपत्ति के हक से वंचित न किया जाए।
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