रुमनी घोष। पिछले एक महीने में भोपाल की त्विषा शर्मा, ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर और ग्वालियर की पलक रंजन की ससुराल में मृत्यु ने समाज से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक को हिला दिया है। ये तीनों मामले, जो महिलाओं की आत्मनिर्भरता के नारे के बावजूद दहेज हत्याओं की चिंताजनक स्थिति को उजागर करते हैं। इन घटनाओं में पीड़िताओं को ससुराल में प्रताड़ना के बाद मायके में भी सुरक्षा नहीं मिल पाती है। कानूनी प्रावधान मौजूद होने के बावजूद सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण बेटियों को शादी के बाद भी बेटों के समान पैतृक संपत्ति के अधिकार नहीं मिल पाते। यह असुरक्षा उन्हें घुटकर जीने या हत्या/आत्महत्या तक ले जाती है। डॉ. वीणा तलवार ओल्डेनबर्ग, जो कोलंबिया विश्वविद्यालय सहित अमेरिकी प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रोफेसर रह चुकी हैं, के अनुसार बेटियों को पैतृक संपत्ति में अनिवार्य हिस्सेदारी देकर उन्हें सुरक्षा कवच प्रदान किया जा सकता है। उन्होंने अपने शोध में बताया कि वैदिक काल में स्त्रीधन के अधिकार धीरे-धीरे ब्रिटिश कानूनों के प्रभाव से बदल गए, जिसके बाद महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को छीनने के लिए परंपराओं का दुरुपयोग शुरू हुआ।
79 वर्षीय डॉ. ओल्डेनबर्ग, जो खुद लखनऊ के प्रतिष्ठित परिवार से हैं और घरेलू हिंसा का शिकार रही हैं, ने अपनी पुस्तक 'डाउरी मर्डर: द इंपीरियल ओरिजिन ऑफ कल्चरल क्राइम' में इस विषय पर गहन अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा लागू 'परमानेंट सेटलमेंट एक्ट-1793' ने भूमि स्वामित्व के नियमों को बदलकर महिलाओं को संपत्ति से वंचित किया। इसके बाद शादी के नाम पर दहेज की मांग और भूमि हड़पने की रणनीति तेज हुई।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2024 में देशभर में दहेज हत्याओं की संख्या 5,737 दर्ज की गई, जो प्रतिदिन औसतन 16 मामलों के बराबर है। 2023 में यह संख्या 6,156 थी। डॉ. ओल्डेनबर्ग का मानना है कि दहेज हत्या के मामलों को केवल पारिवारिक विवाद तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर बताया कि 18वीं सदी में लखनऊ में महिलाओं की मृत्यु दर असामान्य रूप से अधिक थी, जो सामाजिक अत्याचारों की ओर इशारा करती है।
उनका समाधान है कि महिलाओं को शिक्षा और पैतृक संपत्ति में समान अधिकार देकर उन्हें आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जाए। उन्होंने और उनके पति डॉ. फिलिप ओल्डेनबर्ग की शादी को एक 'साझा अनुबंध' के उदाहरण के रूप में पेश किया, जो पारंपरिक रीति-रिवाजों से परे एक कानूनी रूपरेखा प्रदान करता है।




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