डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत में तंबाकू के नुकसान के बारे में जागरूकता है, फिर भी बड़ी संख्या में लोग इसका सेवन करते हैं। सिनेमा हॉलों में तंबाकू-विरोधी विज्ञापन और पैकेटों पर डरावनी चेतावनियाँ दिखाई जाती हैं, लेकिन यह लत को रोकने में अपर्याप्त साबित हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल चेतावनियों से लत पर काबू पाना संभव नहीं है। समस्या यह भी है कि फिल्मों और मनोरंजन उद्योग में धूम्रपान को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है, जो युवाओं पर गहरा प्रभाव डालता है।
भारत में तंबाकू की समस्या सिगरेट तक सीमित नहीं है। गुटखा, खैनी और जर्दा जैसे धूम्रपान रहित उत्पादों का व्यापक उपयोग होता है। अनुमान है कि देश में करीब 2 करोड़ लोग इन उत्पादों का दैनिक सेवन करते हैं। ये उत्पाद अत्यंत सस्ते दामों पर लगभग हर दुकान पर उपलब्ध हैं। एडिनबर्ग विश्वविद्यालय की शोधकर्ता डॉ. मधुरिमा नंदी के अनुसार, धूम्रपान रहित तंबाकू से 28 से अधिक प्रकार के कैंसरजन्य तत्वों की पहचान हुई है। वैश्विक स्तर पर 80% से अधिक उपभोक्ता भारत में निवास करते हैं।
सिगरेट पर भारी कर और चेतावनियाँ हैं, लेकिन धूम्रपान रहित तंबाकू सुलभ और सस्ता बना हुआ है। इसके कारण थूकने की समस्या भी गंभीर है। एक अनुमान के अनुसार, भारतीय प्रतिवर्ष इतने थूक के संग्रहण से 211 ओलंपिक आकार के पूल भरे जा सकते हैं। भारतीय रेलवे को सफाई पर प्रतिवर्ष लगभग 1200 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
औपनिवेशिक काल में इसकी शुरुआत हुई थी। गुजरात के उद्योगपति मनसुखभाई कोठारी ने गुटखा को छोटे पैकेटों में बेचकर इसे जनप्रिय बनाया। दो से पाँच रुपये में मिलने वाला यह उत्पाद सिगरेट की तुलना में अधिक सुलभ था। विशेषज्ञों के अनुसार, गुटखा निकोटिन को तेजी से शरीर में प्रवेश करता है और इसकी लत सिगरेट से तीन गुना अधिक हो सकती है।
सिगरेट का उपयोग शहरी और संपन्न वर्ग में अधिक देखा जाता है, जबकि गुटखा ग्रामीण, कम शिक्षित और आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों में प्रचलित है। डॉ. नंदी के अनुसार, धूम्रपान रहित तंबाकू के उपयोग के प्रमुख कारणों में कम शिक्षा, ग्रामीण आवास, आर्थिक कमजोरी, कम कर, साथियों का दबाव और पारिवारिक आदतें शामिल हैं।
दैनिक मजदूरों के लिए गुटखा एक सस्ता नशा बन जाता है। निकोटिन भूख को अस्थायी रूप से दबाता है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर लोग इसे भोजन के विकल्प की तरह भी इस्तेमाल करते हैं। दिल्ली के नेहरू प्लेस मेट्रो स्टेशन के पास रहने वाले एक बच्चे ने बताया कि बिस्कुट से पेट नहीं भरता, लेकिन गुटखा से भूख कम होती है।
रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण भारत के गरीब परिवार अपने कुल खर्च का 4% तंबाकू पर और केवल 2.5% शिक्षा पर खर्च करते हैं। तंबाकू से जुड़ी बीमारियों के कारण प्रतिवर्ष लगभग 1.84 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी में धकेल जाते हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि उत्पादों को महंगा, कम सुलभ और आकर्षक बनाने के साथ-साथ कर नीति में सुधार और जागरूकता अभियान ज़रूरी हैं।
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