डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत के निजी अस्पतालों में अब सिजेरियन ऑपरेशन के माध्यम से बच्चों का जन्म होना आम बात हो गया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, निजी स्वास्थ्य संस्थानों में होने वाली डिलीवरी का 54% से अधिक हिस्सा सिजेरियन प्रक्रिया से संपन्न होता है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा निर्धारित 10-15% के स्वास्थ्यकर सीमा से काफी ऊपर है।
पश्चिम बंगाल में यह दर सबसे चिंताजनक स्थिति दर्शाती है, जहाँ निजी अस्पतालों में 87.7% जन्म सर्जिकल प्रक्रिया से होते हैं। तेलंगाना (84%) और आंध्र प्रदेश (66%) भी इस मामले में आगे हैं। देश के 18 राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों (दिल्ली व जम्मू-कश्मीर) में निजी अस्पतालों में आधे से अधिक जन्म सिजेरियन के माध्यम से हो रहे हैं।
वर्ष 2004-05 में देश में सिजेरियन डिलीवरी का प्रतिशत मात्र 8.5% था, जो 2015-16 तक बढ़कर 17.2% और वर्तमान में 21.5% (2019-21) तक पहुँच गया है। वर्तमान में देश में हर चार में से एक जन्म (27.2%) सिजेरियन ऑपरेशन से होता है। सरकारी अस्पतालों में यह वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही है - 2005-06 में 15.2% से बढ़कर वर्तमान में 16.9%।
जम्मू-कश्मीर में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है, जहाँ निजी अस्पतालों में सिजेरियन दर 90% और सरकारी अस्पतालों में लगभग 49% है। असम (81.4%) और ओडिशा (76.8%) जैसे राज्यों में निजी अस्पतालों में यह दर अत्यधिक है, परंतु इन क्षेत्रों में कुल सिजेरियन संख्या कम है क्योंकि अधिकांश महिलाएँ सरकारी अस्पतालों में जाती हैं जहाँ यह दर क्रमशः 18% और 22% है।
विश्व स्तर पर ब्राजील (52%), यूके (45%), और अमेरिका (32%) में भी सिजेरियन दर WHO सीमा से ऊपर है। इसके विपरीत स्वीडन (19%) और नॉर्वे (16%) जैसे देशों में यह दर नियंत्रित है, जहाँ बिना चिकित्सकीय आवश्यकता के ऑपरेशनों पर सख्त प्रतिबंध है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में यह प्रवृत्ति आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं की कमी और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच की चुनौतियों को दर्शाती है।


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